Friday, April 19, 2019

पश्चिम बंगाल: क्या 41% महिला उम्मीदवार कुछ बदलाव ला पाएंगी?

भारत में 90 करोड़ मतदाता हैं और उनमें से आधी संख्या महिलाओं की है. बावजूद इसके क़ानून बनाने वाले निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है.

देश में चुनावी माहौल है और एक राजनीतिक पार्टी ने इसे बेहतर करने के लिए 41 फ़ीसदी टिकट महिलाओं को दिया है.

पश्चिम बंगाल की इस यात्रा में मैंने ये जानने की कोशिश की कि क्या इससे कुछ बदलाव आएगा.

सुबह की तेज़ धूप में, चमकीले पीले और नारंगी फूलों से सजी एक खुली जीप पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाक़े के एक गांव से दूसरे गांव जा रही है. रंगीन साड़ी पहने महिलाएं और पुरुष दौड़ते हुए जीप के पास आते हैं और महुआ मोइत्रा को बधाई देते हैं.

वे उन पर चमकीले नारंगी गेंदे की पंखुड़ियों की बौछार करते हैं, उनके गले में माला डालते हैं और कई लोग उनसे हाथ मिलाने जाते हैं. महुआ मोइत्रा भी उनका अभिवादन करती हैं और हाथ जोड़कर कहती हैं, "मुझे अपना आशीर्वाद दें."

जवान लड़के और लड़कियां अपने स्मार्टफोन से उनकी तस्वीर लेते हैं और कुछ सेल्फी भी लेने की कोशिश करते हैं. चुनाव प्रचार अभियान के दौरान कुछ लोग उन्हें नारियल पानी और मिठाई भी देते हैं.

महुआ मोइत्रा कृष्णानगर लोकसभा सीट से राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार हैं.

एक गांव में चुनाव प्रचार के दौरान एक कार्यकर्ता महुआ मोइत्रा के पास आता है और उन्हें बताता है कि एक बुज़ुर्ग बहुत बीमार हैं और वो उनसे मिलने घर के बाहर नहीं आ सकते. महुआ फिर ख़ुद उनके पास जाती हैं और मुलाक़ात करती हैं.

उनकी जीप के पीछे दर्जनों बाइक सवार नारे लगा रहे हैं, "तृणमूल कांग्रेस ज़िंदाबाद, ममता बनर्जी ज़िंदाबाद."

नारे लगाते और रंग-बिरंगे जुलूस के आगे एक छोटा ट्रक है, जिस पर लाउडस्पीकर लगे हैं, उससे बार-बार महुआ मोइत्रा को वोट देने की अपील की जा रही है.

भारत में चुनावी सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं. नेता अपने क्षेत्र में चक्कर लगा रहे हैं. रैलियां कर रहे हैं.

इस दौरान मैंने देशभर की यात्रा की और जानने की कोशिश की कि चुनावों के शोर में क्या वास्तविक मुद्दों पर बात हो रही है, जो करोड़ों लोगों की ज़िंदगियां प्रभावित करते हैं.

भारतीय संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व महज़ 11 फ़ीसदी है. वहीं राज्यों में यह आंकड़ा 09 फ़ीसदी का है.

इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन की इस साल जारी 193 देशों की सूची में भारत महिला प्रतिनिधित्व के मामले में 149वें स्थान पर है.

इस मामले में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान कहीं बेहतर स्थिति में हैं.

देश की संसद और विधानसभाओं में 33 फ़ीसदी सीटों पर महिलाओं को आरक्षण देने से जुड़ा बिल 1996 से लटका हुआ है.

यही वजह है कि पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की 41 फ़ीसदी सीटों पर महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा है. पार्टी के इस फ़ैसले की चर्चा चारों ओर हो रही है.

ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी. साल 2012 में टाइम मैग्ज़ीन ने उनका नाम दुनिया की 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया था.

बीबीसी बंगाली के सुभाज्योति घोष बताते हैं कि तृणमूल कांग्रेस ने विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े महिलाओं उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है. इनमें फ़िल्म अभिनेत्रियां, डॉक्टर, थियेटर कलाकार, आदिवासी कार्यकर्ता और हाल ही में मारे गए एक राजनेता की पत्नी शामिल हैं.

पार्टी की प्रवक्ता और विधायक महुआ मोइत्रा का नाम भी इस सूची में शामिल है. राज्य में 42 लोकसभा सीटें हैं और पार्टी ने 17 सीटों पर महिला उम्मीदवारों को मौक़ा दिया है.

लंदन में अच्छी ख़ासी सैलेरी वाली नौकरी छोड़ने के बाद वो 2009 में भारत लौटीं और भारतीय राजनीति में भाग्य आज़माने का फ़ैसला किया.

उनके इस फ़ैसले पर परिवार वालों ने एतराज़ जताया. उन्होंने मुझे बताया कि उनके मां-बाप ने इसे "पागलपन" क़रार दिया था. पार्टी के कुछ कार्यकर्ता को भी संदेह था कि "वो तो मेमसाहेब हैं और राजनीति में नहीं चल पाएंगी."

लेकिन वो राजनीति में चलीं और साल 2016 के विधानसभा चुनावों में करीमपुर सीट से जीत भी दर्ज कीं. इस सीट पर 1972 से लेफ्ट पार्टियों का क़ब्ज़ा रहा था. अब महुला मोइत्रा की नज़र राष्ट्रीय राजनीति पर है.

वो अपने रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलती हैं. अपने भाषणों में वो कश्मीर के मुद्दे और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ एयर स्ट्राइक पर सवाल खड़े करती हैं.

"यह कहने की क्या बात है कि आपने पाकिस्तान के उन सभी आतंकवादियों को मार डाला? यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आपने पाकिस्तान में घुस कर मारा या कितनों को मारा, महत्वपूर्ण यह है कि आप हमारे सैनिकों को बचाने में सफल नहीं रहे."

वो केंद्र सरकार की विफलताओं को गिनाती हैं. वो नौकरी के मुद्दे पर सरकार को घेरती हैं. इतना ही नहीं वो भारतीय जनता पार्टी पर हिंदू-मुस्लिम में फूट डालने के आरोप लगाती हैं.

महुला मोइत्रा कहती हैं कि इससे पहले का चुनाव सरकार बदलने के लिए था, लेकिन इस बार का चुनाव संविधान की रक्षा के लिए है. यह कोई साधारण चुनाव नहीं है.

चुनावी मैदान में उनके ख़िलाफ़ भाजपा ने भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व खिलाड़ी कल्याण चौबे को उतारा है.

तृणमूल कांग्रेस के संस्थापकों में शामिल डॉ. काकोली घोष दस्तीदार कहती हैं कि यह पार्टी के एजेंडे में लंबे वक़्त से रहा है और किसी भी समाज का उत्थान तब तक नहीं हो सकता है जब तक महिलाओं का उत्थान न हो.

वो बताती हैं कि पिछले लोकसभा चुनावों में पार्टी ने 33 फीसदी सीटों पर महिलाओं को उम्मीदवार बनाया था. उनके 34 सांसदों में से 12 सांसद महिलाएं हैं.

वो कहती हैं कि ममता बनर्जी का मानना है कि महिलाओं के हितों से जुड़े क़ानून तभी बन पाएंगे, जब ज्यादा से ज्यादा महिलाएं सत्ता में होंगी.

डॉ. दस्तीदार के चुनावी क्षेत्र बरसात के कुम्हारा काशीपुर गांव में आयोजित एक सभा में महिलाओं को पहली पंक्ति में बिठाया गया है.

हालांकि उनकी राय इस बारे में अलग-अलग है कि संसद में अधिक महिलाओं के होने से वास्तव में दूसरी महिलाओं का भला होगा.

अध्ययन से पता चला है कि जिन क्षेत्रों की प्रतिनिधि महिलाएं हैं, वहां आर्थिक विकास ज़्यादा हुए हैं क्योंकि वो पुरुषों की तुलना में जल आपूर्ति, बिजली, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे मुद्दों के लिए अधिक चिंतित होती हैं.

Monday, April 15, 2019

उड़ान को लंबा करने में एयरलाइंस कंपनियों का कैसा फ़ायदा?

1960 के दशक में न्यूयॉर्क से लॉस एंजिल्स की उड़ान पूरी करने 5 घंटे लगते थे. न्यूयॉर्क से वाशिंगटन डीसी पहुंचने में सिर्फ़ 45 मिनट लगते थे.

आज न्यूयॉर्क से लॉस एंजिल्स पहुंचने में 6 घंटे से ज़्यादा लगते हैं. न्यूयॉर्क से वाशिंगटन डीसी की उड़ान 75 मिनट की हो गई है, जबकि हवाई अड्डों की दूरी वही है.

इसे "पैडिंग" कहते हैं. एयरलाइंस कंपनियां नहीं चाहतीं कि आप इस रहस्य को जानें, ख़ास कर पर्यावरण पर पड़ रहे इसके असर के बारे में.

पैडिंग वह अतिरिक्त समय है जो ये कंपनियां एक शहर से दूसरे शहर पहुंचने के लिए ख़ुद को देती हैं.

दशकों से यह अनुभव किया जा रहा था कि उड़ान में देर हो रही है. एयरलाइंस कंपनियों ने परिचालन सुधारने की जगह उड़ान का शेड्यूल ही बदल दिया.

मुमकिन है कि यात्रियों को इसमें कुछ भी गलत न दिखे. देर से टेक-ऑफ़ करने पर भी विमान यदि समय से पहले मंजिल तक पहुंच जाए तो भला किसे अच्छा नहीं लगेगा.

इस ग्लोबल ट्रेंड में कई समस्याओं के बीज छिपे हैं. एक तो मुसाफिरों का सफ़र लंबा हो रहा है, दूसरे एयरलाइंस कंपनियों के वक़्त का पाबंद होने का भ्रम पैदा होता है.

इस भ्रम की वजह से उन पर दक्षता बढ़ाने का दबाव नहीं रहता. इसका मतलब है कि हवाई मार्गों पर भीड़ और कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ते रहना.

अमरीकी परिवहन विभाग की एयर ट्रैवल कंज्यूमर रिपोर्ट का हवाला देते हुए एयरलाइंस सलाहकार कंपनी एटीएच समूह के अध्यक्ष कैप्टन माइकल बायडा कहते हैं, "पैडिंग के बावजूद औसत रूप से 30 फीसदी से ज़्यादा उड़ानें 15 मिनट से अधिक की देरी से पहुंचती हैं."

यह आंकड़ा 40 फीसदी का हुआ करता था. लेकिन पैडिंग के कारण समय पर पहुंचने वाले विमानों की तादाद बढ़ गई.

बायडा कहते हैं, "पैडिंग के जरिये एयरलाइंस कंपनियां आपको बेवकूफ बना रही हैं."

पैडिंग की तरकीब अपनाने की जगह अगर कंपनियों ने परिचालन को सुधारा होता तो मुसाफिरों को सीधा फायदा होता.

पैडिंग के कारण ईंधन की लागत बढ़ती है, शोर ज़्यादा होता है और कार्बन डाय-ऑक्साइड का उत्सर्जन भी ज़्यादा होता है. इसकी जगह अगर दक्षता बढ़े तो लागत घटेगी और पर्यावरण का भी भला होगा.

बेशक, एयरलाइंस कंपनियों को मालूम है कि हवाई मुसाफिर वक़्त की पाबंदी को अहमियत देते हैं.

अमरीकी परिवहन विभाग के मुताबिक डेल्टा एयरलाइंस हमेशा यह कोशिश करती है कि उसकी उड़ानें समय से मंजिल तक पहुंचें.

डेल्टा ने विमानों के नये बेड़े, केबिन और हवाई अड्डे की सुविधाओं पर 2 अरब डॉलर का निवेश किया है. यह कंपनी इस बात पर भी जोर देती है कि वक़्त की पाबंदी अपनाकर उसने किराया बढ़ाया है.

तो यदि वक़्त का ख्याल रखने से मुसाफिरों और एयरलाइंस कंपनी, दोनों का फायदा है तो कंपनियां उड़ान का समय बढ़ाने की बजाय दक्षता बढ़ाने पर काम क्यों नहीं करतीं?

किसी भी उड़ान का अंतिम लक्ष्य होता है A0 (ए-ज़ीरो) यानी ठीक समय से मंजिल तक पहुंचना.

यदि कोई उड़ान समय से पहले या देरी से है तो वह कई अन्य चीजों को बाधित कर सकती है, जैसे दरवाजे की उपलब्धता, हवाई अड्डे की क्षमता वगैरह.

उड़ान समय पर है या नहीं, इसे बताने के लिए एक भाषा भी है. उड़ान में जितने मिनट की देरी होती है, उतनी संख्या A0 से जुड़ जाती है.

मिसाल के लिए A15 का मतलब है कि उड़ान 15 मिनट की देरी से है. अमरीका का परिवहन विभाग A0 से लेकर A14 तक को देर नहीं मानता.

आधुनिक डेटा और संचार के आगमन से पहले अमरीकी परिवहन विभाग के इसी मानक से ग्लोबल स्टैंडर्ड बना.

मतलब यह है कि भीड़भाड़ वाले स्लॉट में आने पर भी एयरलाइंस कंपनियों के पास "समय पर" पहुंच जाने का एक मौका रहता है.

एयर ट्रैफिक कंट्रोल हवाई अड्डे पर विमानों की भीड़ कम करने के लिए उनके आगमन को समायोजित करता है. व्यस्त समय में वह विमानों के उतरने की रफ़्तार घटा देता है.

अमरीकी एयरलाइंस कंपनियों के संगठन एयरलाइंस फ़ॉर अमरीका के मुताबिक दुनिया भर की बड़ी कंपनियों ने विमानों के उड़ान पथ को कुशल बनाने के लिए तकनीक पर अरबों डॉलर का निवेश किया है.

किसी उड़ान में देर होने की कई वजहें हो सकती हैं, जैसे- शेड्यूल, एयरपोर्ट पर उतरने के लिए लगी विमानों की कतार, विमान उपलब्धता, गेट उपलब्धता, रखरखाव और चालक दल की वैधता.

बायडा का मानना है कि इसके लिए जिम्मेदार 80 फीसदी कारकों पर एयरलाइंस कंपनी का नियंत्रण होता है. लेकिन विमान हवा में हो तो वे सब कुछ एयर ट्रैफिक कंट्रोल पर छोड़ देते हैं.

वह कहते हैं, "एक बार जब विमान उड़ान भर लेते हैं तो उनके अगले एयरपोर्ट पर पहुंचने तक एयरलाइंस कंपनियां उनके बारे में भूल जाती हैं."

बायडा एक बेहतर तरीका सुझाते हैं. उनका कहना है कि कंपनियां विमानों को ट्रैक कर सकती हैं और उड़ान के दौरान भी परिचालन को समायोजित कर सकती हैं. विमानों की रफ़्तार और एयरपोर्ट पर उनकी कतार का प्रबंधन भी किया जा सकता है.

इससे एयर ट्रैफिक कंट्रोल को सिर्फ़ विमानों के सुरक्षित परिचालन पर ध्यान केंद्रित करना होगा.

रिटायर एयरलाइन एक्जीक्यूटिव टॉम हेंड्रिक्स बीबीसी कैपिटल से कहते हैं, "समस्या का एक हिस्सा उड़ान शेड्यूल में है जिसे एयरलाइंस कंपनियां एकदम आदर्श स्थिति के लिए तैयार करती हैं."

"लेकिन किसी भी दिन मौसम, एयर ट्रैफिक कंट्रोल और कंपनी नेटवर्क का व्यवधान हो सकता है."

हेंड्रिक्स का मानना है कि ज़्यादातर दिनों में एयरलाइंस कंपनियां अपने विमानों को कुशलता के साथ मंजिल तक पहुंचाने में लगी रहती हैं क्योंकि यह उनकी आर्थिक क़ामयाबी का अभिन्न हिस्सा है.

एक अन्य विकल्प विमानों की संख्या घटाने का हो सकता है. लेकिन उड़ान शेड्यूल उपभोक्ताओं की मांग पूरी करने के लिए बनाए जाते हैं. इसलिए अगर उड़ानों की तादाद कम होगी तो किराये बढ़ेंगे.

Monday, April 8, 2019

मुझमें राजनीतिक योग्यता नहीं, पॉलिटिक्स में नहीं आ रही: माधुरी दीक्षित

चुनाव के दौरान कई फ़िल्मी सितारे भी अपनी भाग्य आज़माइश के लिए मैदान में उतरते हैं. हाल ही में 90 के दशक की अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर भी कांग्रेस पार्टी से जुड़ीं और मुंबई से चुनाव लड़ रही हैं.

पिछले कुछ समय से यह अटकलें भी लगाई जा रही थी कि मशहूर अभिनेत्री माधुरी दीक्षित नेने भी किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ेंगी लेकिन उन्होंने इन तमाम अटकलों को विराम देते हुए कहा कि उनकी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है और न ही वो इसमें क़दम रख रही हैं.

बीबीसी से रूबरू हुईं माधुरी दीक्षित ने कहा, "मैं राजनीति में नहीं आ रही हूं. राजनीति में आने के लिए दिलचस्पी होनी चाहिए या ज्ञान होना चाहिए. अगर आप राजनीति में जा रहे हैं तो आप को थोड़ी बहुत जानकारी होनी चाहिए."

वो कहती हैं कि, "अगर फ़िल्म अभिनेत्रियों को लगता है कि उनमें राजनीति करने की योग्यता है तो ज़रूर करना चाहिए. मेरा पूरा समर्थन उन्हें है पर मैं राजनीति में नहीं आ रही हूं."

रुपहले पर्दे पर अपनी अदाकारी, नृत्य और मौजूदगी से लोगों को अपना दीवाना बनाने वाली माधुरी दीक्षित ब्लैक एंड वाइट हिंदी फ़िल्मों की दीवानी रही हैं.

उनका कहना है कि फ़िल्मों के उस दौर को वो जब भी देखती हैं, अभिभूत हो जाती हैं.

माधुरी कहती हैं, "मुझे मधुबाला जी, मीना कुमारी जी और नूतन जी से प्यार है. उस ज़माने में उन्हें कितने अच्छे किरदार को निभाने का मौक़ा मिला था. मधुबाला जी इतनी ख़ूबसूरत थीं कि उन्हें देखकर मुझे लगता है कि काश तब जन्मी होती तो उन्हें देख पाती."

माधुरी दीक्षित और संजय दत्त की जोड़ी ने 90 के दशक में कई हिट फ़िल्में दी जिसमें 'खलनायक', 'साजन', 'थानेदार' और 'इलाका' शामिल हैं.

क़रीब दो दशक के बाद माधुरी दीक्षित एक बार फिर संजय दत्त के साथ अभिषेक वर्मन की फ़िल्म 'कलंक' में नज़र आ रही हैं.

उन्हें ख़ुशी है कि उन्हें पुराने सह-कलाकार के साथ काम करने का मौक़ा मिला.

उन्होंने कहा कि इस बार काम करना बहुत आनंददायक रहा.

माधुरी दीक्षित ने कहा कि अभिनय में संजय दत्त की छवि फ़िल्म 'साजन' ने बदली. संजय दत्त को अक्सर एक्शन से जोड़ा जाता था और जब 'साजन' में लोगों को पता चला की संजय दत्त एक विकलांग इंसान का रोल कर रहे हैं तो सब उन्हें कहने लगे की तुम लोग पागल हो गए हो, जो एक्शन करता है उसे विकलांग का रोल दे रहे हो. ये फ़िल्म बिल्कुल नहीं चलेगी. पर 'साजन' के बाद संजय दत्त को एक अलग पहचान मिली.

मराठी फ़िल्मों की तरफ़ रुझान रखने वाली माधुरी दीक्षित ने बतौर निर्देशक हाल ही में '15 अगस्त' को नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ किया.

मराठी फ़िल्मों के थिएटर में रिलीज़ को लेकर परेशानी पर माधुरी दीक्षित कहती हैं, "मराठी फ़िल्मों को सिर्फ़ 400 थिएटर मिलते हैं उसमें भी अगर 2-3 मराठी फ़िल्म आ जाए तो थिएटर और भी कम हो जाते हैं. फिर अगर कोई हिंदी फ़िल्म चल पड़ी तो मराठी फ़िल्म के शो कट जाते हैं."

इन परेशानियों के मद्देनज़र माधुरी ने अपनी फ़िल्म को नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ करने का फ़ैसला किया जिससे फ़िल्म को अधिक से अधिक दर्शकों तक पहुंचाया जा सके.

अभिषेक वर्मन के निर्देशिन में बनी फ़िल्म 'कलंक' में माधुरी दीक्षित के साथ मुख्य भूमिका में संजय दत्त, वरुण धवन, आलिया भट्ट, सोनाक्षी सिन्हा और आदित्य रॉय कपूर नज़र आएंगे. फ़िल्म 17 अप्रैल को रिलीज़ होगी.