कादर ख़ान के अस्पताल में भर्ती होने के बाद सोशल मीडिया पर रविवार को उनके निधन की अफ़वाह फैल गई थी जिसे बाद में उनके बेटे सरफ़राज़ ने खारिज कर दिया.
सरफ़राज़ ने बीबीसी को बताया कि उनके पिता के निधन की ख़बर झूठी है. वो कनाडा में एक अस्पताल में भर्ती हैं.
कादर ख़ान की सेहत पिछले कुछ दिनों से चर्चा में है और सोशल मीडिया पर उनकी सेहत को लेकर ट्वीट किए जा रहे हैं.
अभिनेता अमिताभ बच्चन और अभिनेत्री रवीना टंडन ने ट्वीट कर उनके स्वास्थ्य में बेहतरी के लिए प्रार्थना की.
अमिताभ बच्चन ने ट्वीट किया, ''अपार प्रतिभा वाले अभिनेता और लेखक अस्पताल में भर्ती हैं. उनके बेहतर स्वास्थ्य और जल्द ठीक होने के लिए प्रार्थनाएं और दुआएं. उन्हें स्टेज पर काम करते देखा, मेरी फ़िल्मों के लिए शानदार लेखन किया... एक महानी साथी.. और बहुत कम लोग जानते हैं, गणित पढ़ाने वाले.''
वहीं, रवीना टंडन ने ट्वीट किया, ''कादर जी, आप हमारी ज़हन में और प्रार्थनाओं में हैं. आपके जल्दी ठीक होने की कामना करती हूं. हमने साथ में कुछ गज़ब की फ़िल्में की हैं और यह जानकारी बहुत खुशी होगी कि आप पूरी तरह ठीक हैं.''
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कादर खान को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. उन्हें डॉक्टर्स ने रेग्यूलर वेंटिलेटर से हटाकर बीआईपीएपी वेंटिलेटर पर रख दिया है.
बताया जा रहा है कि कादर ख़ान को प्रोग्रेसिव सुप्रान्यूक्लियर पाल्सी नाम की बीमारी है, जिसमें संतुलन बनाने और चलने में दिक्कत होती है. इसमें भूलने की बीमारी भी हो जाती है.
81 साल के कादर खान अपने बेटे और बहू के साथ कनाडा में रह रहे हैं.
हिंदी सिनेमा में अपनी गहरी छाप छोड़ने वाले कादर ख़ान का जन्म अफ़ग़ानिस्तान के काबुल में हुआ था. उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री ली और कुछ समय तक पढ़ाते भी रहे. लेकिन, थियेटर और लेखन में रूचि के कारण उन्होंने सिनेमा जगत में कदम रखा.
Monday, December 31, 2018
Wednesday, December 26, 2018
GST का सिंगल स्लैब मूर्खतापूर्ण लगता था, अब मिशन कैसे: पी. चिदंबरम
केंद्र सरकार द्वारा वस्तु एवं सेवा कर (GST) में लगातार दी जा रही छूट पर पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने निशाना साधा है. बुधवार को कई ट्वीट करते हुए पूर्व वित्त मंत्री ने कहा कि कल तक जो GST को सिंगल स्लैब में लाना एक बेवकूफाना विचार था, अब ये सरकार का घोषित लक्ष्य होता जा रहा है. पी. चिदंबरम ने बुधवार को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली के घोषित लक्ष्यों में किए गए बदलाव पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसे क्यों बदला जा रहा है.
उन्होंने कहा, "कल तक जीएसटी की उच्चतम दर 18 फीसदी अव्यवहारिक थी. कल से कांग्रेस पार्टी की 18 पर्सेंट उच्चतम दर की वास्तविक मांग सरकार का घोषित लक्ष्य हो गई है." उन्होंने कहा, "कल तक, मुख्य आर्थिक सलाहकार की मानक दर को 15 फीसदी करने की आरएनआर रिपोर्ट कूड़ेदान में थी. कल इसे निकाला गया और विदेश मंत्री की मेज पर पेश किया गया और तुरंत स्वीकार कर लिया गया."
अरुण जेटली ने दिए थे संकेत
आपको बता दें कि पूर्व वित्त मंत्री ने ये ट्वीट वित्त मंत्री अरुण जेटली के सोमवार को यह संकेत देने के दो दिनों बाद ही किए हैं कि देश में अंतत: जीएसटी की मानक दर एक ही हो सकती है. उन्होंने कहा था कि जल्द ही लग्जरी और 'सिन गुड्स' को छोड़कर अन्य सभी वस्तुओं पर 28 फीसदी जीएसटी स्लैब खत्म किया जा सकता है.
उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट में यह भी कहा कि मानक दर 12 से 18 फीसदी के बीच हो सकती है. जेटली का जीएसटी ब्लॉग तीन हिंदी भाषी राज्यों - छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनाव परिणाम आने के एक पखवाड़े के बाद आया है. 2019 के आम चुनाव से कुछ महीनों पहले आए ये चुनाव परिणाम केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में नहीं रहे थे.
आपको बता दें कि अभी कुछ दिन पहले ही GST काउंसिल के बैठक में कई वस्तुओं से GST कम किया था. इन वस्तुओं पर GST स्लैब 28 % से घटाकर 18 % कर दिया गया. 100 रुपये तक के सिनेमा टिकट पर GST घटाकर 12 फीसदी किया गया है, जबकि 100 रुपये से महंगे सिनेमा टिकट पर GST 28 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी किया गया है. GST रिटर्न दाखिल करने की नई प्रणाली एक जनवरी 2019 से लागू होगी.
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म में राजकुमार एक संघर्षरत गुजराती व्यवसायी के रूप में दिखेंगे और मौनी उनकी पत्नी के किरदार में दिखेंगी. गुजराती निर्देशक मिखिल मुसले की यह पहली बॉलीवुड फिल्म है. वर्ष 2016 की उनकी गुजराती थ्रिलर-फिल्म 'रॉन्ग साइड राजू' को सर्वश्रेष्ठ गुजराती फीचर फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
बता दें राजकुमार राव के लिए साल 2018 सफलता के नए आयाम लेकर आया है. उनकी कई फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया. इनमें न्यूटन, स्त्री जैसी फिल्में शामिल हैं. साल 2019 में राजकुमार राव सोनम कपूर के साथ फिल्म एक लड़की को देखा... में नजर आने वाले हैं.
उन्होंने कहा, "कल तक जीएसटी की उच्चतम दर 18 फीसदी अव्यवहारिक थी. कल से कांग्रेस पार्टी की 18 पर्सेंट उच्चतम दर की वास्तविक मांग सरकार का घोषित लक्ष्य हो गई है." उन्होंने कहा, "कल तक, मुख्य आर्थिक सलाहकार की मानक दर को 15 फीसदी करने की आरएनआर रिपोर्ट कूड़ेदान में थी. कल इसे निकाला गया और विदेश मंत्री की मेज पर पेश किया गया और तुरंत स्वीकार कर लिया गया."
अरुण जेटली ने दिए थे संकेत
आपको बता दें कि पूर्व वित्त मंत्री ने ये ट्वीट वित्त मंत्री अरुण जेटली के सोमवार को यह संकेत देने के दो दिनों बाद ही किए हैं कि देश में अंतत: जीएसटी की मानक दर एक ही हो सकती है. उन्होंने कहा था कि जल्द ही लग्जरी और 'सिन गुड्स' को छोड़कर अन्य सभी वस्तुओं पर 28 फीसदी जीएसटी स्लैब खत्म किया जा सकता है.
उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट में यह भी कहा कि मानक दर 12 से 18 फीसदी के बीच हो सकती है. जेटली का जीएसटी ब्लॉग तीन हिंदी भाषी राज्यों - छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनाव परिणाम आने के एक पखवाड़े के बाद आया है. 2019 के आम चुनाव से कुछ महीनों पहले आए ये चुनाव परिणाम केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में नहीं रहे थे.
आपको बता दें कि अभी कुछ दिन पहले ही GST काउंसिल के बैठक में कई वस्तुओं से GST कम किया था. इन वस्तुओं पर GST स्लैब 28 % से घटाकर 18 % कर दिया गया. 100 रुपये तक के सिनेमा टिकट पर GST घटाकर 12 फीसदी किया गया है, जबकि 100 रुपये से महंगे सिनेमा टिकट पर GST 28 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी किया गया है. GST रिटर्न दाखिल करने की नई प्रणाली एक जनवरी 2019 से लागू होगी.
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म में राजकुमार एक संघर्षरत गुजराती व्यवसायी के रूप में दिखेंगे और मौनी उनकी पत्नी के किरदार में दिखेंगी. गुजराती निर्देशक मिखिल मुसले की यह पहली बॉलीवुड फिल्म है. वर्ष 2016 की उनकी गुजराती थ्रिलर-फिल्म 'रॉन्ग साइड राजू' को सर्वश्रेष्ठ गुजराती फीचर फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
बता दें राजकुमार राव के लिए साल 2018 सफलता के नए आयाम लेकर आया है. उनकी कई फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया. इनमें न्यूटन, स्त्री जैसी फिल्में शामिल हैं. साल 2019 में राजकुमार राव सोनम कपूर के साथ फिल्म एक लड़की को देखा... में नजर आने वाले हैं.
Sunday, December 16, 2018
भारत का विश्व कप हॉकी अभियान: कैसे टूटा जीत का सपना
ये भविष्य की उम्मीद हो सकती है. ये पिछले 23 सालों में भारत का श्रेष्ठतम प्रदर्शन था. युवा खिलाड़ियों ने साबित कर दिया कि वो इस विशाल मंच से भयभीत नहीं हैं और सबक सीखने को तैयार हैं. दूसरी ओर इसे ऐसा मौका भी कहा जा सकता है, जिसे खो दिया गया, क्योंकि मेजबानों से इस टूर्नामेंट में चमकने की उम्मीद थी.
पिछले कुछ सालों में भारत को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं मिली हैं. सर्वश्रेष्ठ टीमों से सामना हुआ है और उच्च स्तरीय वैज्ञानिक तथा रणनीतिक सहयोग ने उन्हें बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए तैयार किया है.
टीम से थी बड़ी उम्मीद
भारत के लिए साल 2018 मिला-जुला रहा. गोल्ड कोस्ट में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में ख़राब प्रदर्शन के बाद भारत चौथे स्थान पर रहा. हॉलैंड में हुई चैम्पियन्स ट्रॉफ़ी में थोड़ा सुधार हुआ और भारत रजत पदक पर कब्जा करने में कामयाब रहा. जकार्ता में हुए एशियाई खेलों में भारत को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा.
घरेलू मैदान पर आयोजित विश्व कप भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती और एक महत्त्वपूर्ण अवसर था. भारत ने साल 1975 में अजित पाल सिंह की अगुवाई में विश्व कप जीता था. किसी को उम्मीद नहीं थी कि मौजूदा टीम को उस तरह विजेता बनने का गौरव हासिल होगा, लेकिन खोए हुए गौरव की एक झलक देखने की उम्मीद ज़रूर थी.
43 साल पहले बने थे विश्व विजेता
43 साल हो चुके हैं, जब भारत को विश्व कप या ओलम्पिक जैसे मंच पर सीना तानकर खड़ा होने का मौका मिला हो. साफ़-साफ़ कहा जाए तो पिछले कुछ सालों में भारतीय टीम में कुछ सुधार ज़रूर हुआ है, लेकिन सालों की कड़ी मेहनत, वैज्ञानिक सहयोग, वक्त और धन खर्च करने का नतीजा बड़ी प्रतियोगिताओं में देखने को नहीं मिला है.
घरेलू मैदान पर हुए विश्व कप में इस टीम से उम्मीद थी कि वो अतीत को भूलकर नया अध्याय शुरू करेगी.
सालों से भारत का खेल दोयम दर्जे का रहा है. इस बार मौका भुनाने की उम्मीद थी. उन्हें भीड़ का समर्थन हासिल था और घरेलू वातावरण उनके अनुकूल था. हालांकि विश्व कप से पहले कई उठापटक हुए. मशहूर सरदार सिंह ने हॉकी को अलविदा कह दिया और तजुर्बेकार एस. वी. सुनील और रुपिन्दर पाल सिंह टीम से बाहर रहे, फिर भी इस प्रतियोगिता में भारत से कुछ कर दिखाने की उम्मीद थी.
पिछले कुछ सालों में भारत को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं मिली हैं. सर्वश्रेष्ठ टीमों से सामना हुआ है और उच्च स्तरीय वैज्ञानिक तथा रणनीतिक सहयोग ने उन्हें बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए तैयार किया है.
टीम से थी बड़ी उम्मीद
भारत के लिए साल 2018 मिला-जुला रहा. गोल्ड कोस्ट में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में ख़राब प्रदर्शन के बाद भारत चौथे स्थान पर रहा. हॉलैंड में हुई चैम्पियन्स ट्रॉफ़ी में थोड़ा सुधार हुआ और भारत रजत पदक पर कब्जा करने में कामयाब रहा. जकार्ता में हुए एशियाई खेलों में भारत को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा.
घरेलू मैदान पर आयोजित विश्व कप भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती और एक महत्त्वपूर्ण अवसर था. भारत ने साल 1975 में अजित पाल सिंह की अगुवाई में विश्व कप जीता था. किसी को उम्मीद नहीं थी कि मौजूदा टीम को उस तरह विजेता बनने का गौरव हासिल होगा, लेकिन खोए हुए गौरव की एक झलक देखने की उम्मीद ज़रूर थी.
43 साल पहले बने थे विश्व विजेता
43 साल हो चुके हैं, जब भारत को विश्व कप या ओलम्पिक जैसे मंच पर सीना तानकर खड़ा होने का मौका मिला हो. साफ़-साफ़ कहा जाए तो पिछले कुछ सालों में भारतीय टीम में कुछ सुधार ज़रूर हुआ है, लेकिन सालों की कड़ी मेहनत, वैज्ञानिक सहयोग, वक्त और धन खर्च करने का नतीजा बड़ी प्रतियोगिताओं में देखने को नहीं मिला है.
घरेलू मैदान पर हुए विश्व कप में इस टीम से उम्मीद थी कि वो अतीत को भूलकर नया अध्याय शुरू करेगी.
सालों से भारत का खेल दोयम दर्जे का रहा है. इस बार मौका भुनाने की उम्मीद थी. उन्हें भीड़ का समर्थन हासिल था और घरेलू वातावरण उनके अनुकूल था. हालांकि विश्व कप से पहले कई उठापटक हुए. मशहूर सरदार सिंह ने हॉकी को अलविदा कह दिया और तजुर्बेकार एस. वी. सुनील और रुपिन्दर पाल सिंह टीम से बाहर रहे, फिर भी इस प्रतियोगिता में भारत से कुछ कर दिखाने की उम्मीद थी.
Thursday, December 13, 2018
मोदी लहर में भी नहीं डिगा था ये नेता, अब बन सकता है छत्तीसगढ़ का CM!
मध्य प्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्री के नाम पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने फैसला ले लिया है. राजस्थान की कमान अशोक गहलोत, मध्य प्रदेश की कमान कमलनाथ को मिली है. अब सभी की नजरें छत्तीसगढ़ पर हैं, सूत्रों की मानें तो ताम्रध्वज साहू (Tamradhwaj Sahu) मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे चल रहे हैं. उनके अलावा भूपेश बघेल, टीएस सिंघदेव के नाम भी रेस में हैं.
रेस में सबसे आगे क्यों साहू?
2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद ताम्रध्वज साहू छत्तीसगढ़ में अपना गढ़ बचा पाए थे. दुर्ग लोकसभा से ताम्रध्वज साहू सांसद चुने गए थे और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से इकलौते सांसद चुने गए. ताम्रध्वज को उनके सरल स्वभाव और अनुभव का फायदा मिला है.
ओबीसी वोट पाने में बड़ी अहमियत
राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अनुभवी नेताओं को मौका देने के बाद छत्तीसगढ़ में भी अनुभव को तवज्जो मिलती दिख रही है. ताम्रध्वज साहू राज्य में चुनाव के दौरान ओबीसी वोट पाने में कामयाब रहे. छत्तीसगढ़ में साहू समाज काफी अधिक मात्रा में हैं, ऐसे में उनका नाम नजरअंदाज करना इतना आसान नहीं है. साफ है कि जातिगत समीकरण को साधते हुए और 2019 को ध्यान में रखते हुए ताम्रध्वज साहू कांग्रेस के लिए सबसे सटीक च्वाइस होंगे.
दुर्ग से सांसद रहे साहू ने इस विधानसभा चुनाव में दुर्ग ग्रामीण विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था. उनके कंधों पर अभी तक OBC-SC-ST वोट लाने की जिम्मेदारी थी. वह प्रदेश कांग्रेस के ओबीसी यूनिट के प्रमुख भी हैं.
और कौन हैं रेस में...
बता दें कि ताम्रध्वज साहू के अलावा भी छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनने की रेस में भूपेश बघेल, टीएस सिंह देव और चरणदास महंत जैसे नेता भी चल रहे हैं.
आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ की 90 सीटों पर कांग्रेस की लहर देखने को मिली. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को 68, भारतीय जनता पार्टी को 15 और बसपा को दो सीटें मिली हैं.
रेस में सबसे आगे क्यों साहू?
2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद ताम्रध्वज साहू छत्तीसगढ़ में अपना गढ़ बचा पाए थे. दुर्ग लोकसभा से ताम्रध्वज साहू सांसद चुने गए थे और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से इकलौते सांसद चुने गए. ताम्रध्वज को उनके सरल स्वभाव और अनुभव का फायदा मिला है.
ओबीसी वोट पाने में बड़ी अहमियत
राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अनुभवी नेताओं को मौका देने के बाद छत्तीसगढ़ में भी अनुभव को तवज्जो मिलती दिख रही है. ताम्रध्वज साहू राज्य में चुनाव के दौरान ओबीसी वोट पाने में कामयाब रहे. छत्तीसगढ़ में साहू समाज काफी अधिक मात्रा में हैं, ऐसे में उनका नाम नजरअंदाज करना इतना आसान नहीं है. साफ है कि जातिगत समीकरण को साधते हुए और 2019 को ध्यान में रखते हुए ताम्रध्वज साहू कांग्रेस के लिए सबसे सटीक च्वाइस होंगे.
दुर्ग से सांसद रहे साहू ने इस विधानसभा चुनाव में दुर्ग ग्रामीण विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था. उनके कंधों पर अभी तक OBC-SC-ST वोट लाने की जिम्मेदारी थी. वह प्रदेश कांग्रेस के ओबीसी यूनिट के प्रमुख भी हैं.
और कौन हैं रेस में...
बता दें कि ताम्रध्वज साहू के अलावा भी छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनने की रेस में भूपेश बघेल, टीएस सिंह देव और चरणदास महंत जैसे नेता भी चल रहे हैं.
आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ की 90 सीटों पर कांग्रेस की लहर देखने को मिली. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को 68, भारतीय जनता पार्टी को 15 और बसपा को दो सीटें मिली हैं.
Monday, December 10, 2018
10 साल पहली रंजिश में दोहरा हत्याकांड, 2 गिरफ्तार
नोएडा के सेक्टर 46 में हुए शूटआउट और मर्डर का खुलासा करते हुए पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया है. पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से पिस्टल, तमंचा और बाइक बरामद की है. पुलिस के अनुसार इस दोहरे हत्याकांड को पुरानी रंजिश के चलते अंजाम दिया गया था.
इस मामले में पुलिस की गिरफ्त में आए सूरज और प्रेम प्रभाकर पर फिरोजाबाद के रहने वाले अनिल उर्फ नीलू और उसके साथी हरिनाथ की हत्या करने का आरोप है. एसपी सिटी का कहना है, कि फिरोजाबाद निवासी भोलई उर्फ जितेन्द्र के परिवार से मृतक अनिल के परिवार की 10 सालों से दुश्मनी चली आ रही है. भोलई ने ही इस दोहरे हत्याकांड की साजिश रची थी, लेकिन वह अभी फरार है.
वारदात के दिन घटनास्थल पर कुल छह हमलावर पहुंचे थे, उन सब की तलाश की जा रही है. वारदात में एक चार पहिया वाहन का भी इस्तेमाल हुआ था और करीब 18 से 20 राउंड गोलियां चली थीं. मौके से कारतूस के 15 खोखे और दो जिंदा कारतूस बरामद हुए थे. हमले में अनिल के सिर में चार गोलियां लगी थीं और उसकी मौके पर मौत हो गई थी, जबकि हरिनाथ की दिल्ली में इलाज के दौरान मौत हुई थी.
एसपी सिटी ने बताया कि रंजिश की शुरुआत साल 2008 में हुई थी. तब मुख्य आरोपी भोलई ने अनिल के बड़े भाई चन्द्रपाल की हत्या कर दी थी. इसके बाद इसी का बदला लेने के लिए अनिल ने भोलई के चाचा जोहारलाल का कत्ल कर दिया था. भोलई कुछ समय पहले ही जेल से छूटकर बाहर आया है. जेल से छूटने के बाद भोलई ने अपने दोस्त टीटू, मन्नू व कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर अनिल उर्फ नीलू की हत्या की साजिश रची. इसके लिए उसने भाड़े के शूटरों को खोजा. शूटरों को डेढ़ लाख रुपये देने की बात थी.
एसपी सिटी ने दावा किया कि अनिल उर्फ नीलू को खनन का ठेका दिलाने का झांसा देकर फिरोजाबाद से नोएडा बुलाया गया था. इन सब ने पहले मथुरा मे हत्या करने की कोशिश की थी लेकिन इसमें वे विफल रहे थे. इसके बाद फिर नोएडा में वारदात को अंजाम दिया.
गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के एक निजी होटल में ईवीएम मशीन और सागर जिले में बिना नंबर की स्कूल बस से स्ट्रॉन्ग रूम में ईवीएम पहुंचाए जाने का वीडियो जारी करते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजेपी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनादेश को पटलने की कोशिश कर रही है. वहीं, एक अन्य मामले में शुक्रवार को ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में लगभग एक घंटे के लिए बिजली नहीं होने की वजह से स्ट्रॉन्ग रूम का सीसीटीवी और एलईडी डिस्प्ले इस अवधि में काम नहीं कर पाया.
इन शिकायतों पर चुनाव आयोग ने भी माना है कि मध्य प्रदेश में ऐसी दो घटनाएं हुईं थीं जिसमें ईवीएम को लेकर नियमावली का पालन नहीं किया गया. लेकिन आयोग का कहना था कि यह गलती प्रक्रिया तक ही सीमित है और मशीनों से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई. लेकिन आयोग ने एक अधिकारी को मशीने देरी से जमा कराने के आरोप में सस्पेंड कर दिया.
इस मामले में पुलिस की गिरफ्त में आए सूरज और प्रेम प्रभाकर पर फिरोजाबाद के रहने वाले अनिल उर्फ नीलू और उसके साथी हरिनाथ की हत्या करने का आरोप है. एसपी सिटी का कहना है, कि फिरोजाबाद निवासी भोलई उर्फ जितेन्द्र के परिवार से मृतक अनिल के परिवार की 10 सालों से दुश्मनी चली आ रही है. भोलई ने ही इस दोहरे हत्याकांड की साजिश रची थी, लेकिन वह अभी फरार है.
वारदात के दिन घटनास्थल पर कुल छह हमलावर पहुंचे थे, उन सब की तलाश की जा रही है. वारदात में एक चार पहिया वाहन का भी इस्तेमाल हुआ था और करीब 18 से 20 राउंड गोलियां चली थीं. मौके से कारतूस के 15 खोखे और दो जिंदा कारतूस बरामद हुए थे. हमले में अनिल के सिर में चार गोलियां लगी थीं और उसकी मौके पर मौत हो गई थी, जबकि हरिनाथ की दिल्ली में इलाज के दौरान मौत हुई थी.
एसपी सिटी ने बताया कि रंजिश की शुरुआत साल 2008 में हुई थी. तब मुख्य आरोपी भोलई ने अनिल के बड़े भाई चन्द्रपाल की हत्या कर दी थी. इसके बाद इसी का बदला लेने के लिए अनिल ने भोलई के चाचा जोहारलाल का कत्ल कर दिया था. भोलई कुछ समय पहले ही जेल से छूटकर बाहर आया है. जेल से छूटने के बाद भोलई ने अपने दोस्त टीटू, मन्नू व कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर अनिल उर्फ नीलू की हत्या की साजिश रची. इसके लिए उसने भाड़े के शूटरों को खोजा. शूटरों को डेढ़ लाख रुपये देने की बात थी.
एसपी सिटी ने दावा किया कि अनिल उर्फ नीलू को खनन का ठेका दिलाने का झांसा देकर फिरोजाबाद से नोएडा बुलाया गया था. इन सब ने पहले मथुरा मे हत्या करने की कोशिश की थी लेकिन इसमें वे विफल रहे थे. इसके बाद फिर नोएडा में वारदात को अंजाम दिया.
गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के एक निजी होटल में ईवीएम मशीन और सागर जिले में बिना नंबर की स्कूल बस से स्ट्रॉन्ग रूम में ईवीएम पहुंचाए जाने का वीडियो जारी करते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजेपी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनादेश को पटलने की कोशिश कर रही है. वहीं, एक अन्य मामले में शुक्रवार को ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में लगभग एक घंटे के लिए बिजली नहीं होने की वजह से स्ट्रॉन्ग रूम का सीसीटीवी और एलईडी डिस्प्ले इस अवधि में काम नहीं कर पाया.
इन शिकायतों पर चुनाव आयोग ने भी माना है कि मध्य प्रदेश में ऐसी दो घटनाएं हुईं थीं जिसमें ईवीएम को लेकर नियमावली का पालन नहीं किया गया. लेकिन आयोग का कहना था कि यह गलती प्रक्रिया तक ही सीमित है और मशीनों से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई. लेकिन आयोग ने एक अधिकारी को मशीने देरी से जमा कराने के आरोप में सस्पेंड कर दिया.
Wednesday, December 5, 2018
किसी वर्जिन से संबंध का मतलब एड्स से बचाव नहीं
एचआईवी संक्रमण एक बड़ी वैश्विक स्वास्थ्य समस्या है, जिसकी वजह से अब तक क़रीब 3.5 करोड़ लोग अपनी जान गवां चुके हैं.
यह आंकड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन का है. इन आंकड़ों के मुताबिक़ बीते साल एचआईवी से जुड़ी समस्याओं की वजह से क़रीब 10 लाख लोगों की मौत हो गई थी.
क़रीब 3.7 करोड़ लोग इस वायरस की चपेट में हैं. ऐसे लोगों की 70 फ़ीसदी आबादी अफ़्रीका में रहती है. साल 2017 में यहां 18 लाख नए लोग इस जानलेवा वायरस के शिकार बने.
एचआईवी संक्रमण का सीधा मतलब एड्स से है क्योंकि इसी वायरस की पहचान से एड्स की पहचान संभव है.
1980 के दशक में पहली बार इसके फ़ैलने की बात सामने आई. इसकी पहचान के बाद कई बातें इस बारे में कही गईं.
यह कैसे फ़ैलता है, एचआईवी संक्रमित लोगों के साथ जीना कितना मुश्किल है और न जाने क्या-क्या. इनमें से कुछ मिथ का प्रचार लोगों के बीच ख़ूब हुआ.
वर्ल्ड एड्स डे के मौक़े पर हम ऐसे ही मिथों के बारे में बताने जा रहे हैं.
मिथ: एचआईवी संक्रमित लोगों के साथ रहने से एड्स हो जाता है
यह एक ग़लतफ़हमी है, जिसका प्रचार काफ़ी लंबे वक़्त से होता आ रहा है. इसे दूर करने के लिए जागरूकता अभियान तक चलाए गए हैं पर उसका कोई बहुत ज़्यादा असर देखने को नहीं मिला है.
साल 2016 में 20 फ़ीसदी लोगों का मानना था कि एचआईवी संक्रमण हाथ मिलाने, गले मिलने से फ़ैलते हैं. उनका यह भी मानना था कि यह इंसान के लार और पेशाब के ज़रिए भी फ़ैलता है.
ये बात बिल्कुल सही नहीं है. वैकल्पिक चिकित्सा, यौन संबंध बनाने के बाद नहाने या किसी कुंवारे व्यक्ति या महिला के साथ यौन संबंध रखने से एचआईवी से सुरक्षा नहीं तय हो जाती.
वर्जिन के साथ संबंध बनाने' की दलील अफ़्रीका के कुछ इलाक़ों, भारत और थाईलैंड के कुछ जगहों में दी जाती था. लेकिन ये असल में ख़तरनाक़ है.
इस सोच ने कई युवतियों के बलात्कार और कुछ मामलों में बच्चों को भी एचआईवी संक्रमण के ख़तरे में डाल दिया.
माना जाता है कि इस सोच की जड़ें 16वीं सदी के यूरोप से जुड़ी हैं जब लोगों को सिफ़लिस और गोनोरिया जैसी बीमारियां होने लगीं थीं. इस तरह के क़दम इन बीमारियों के इलाज में भी कारगर साबित नहीं होते.
जहां तक प्रार्थनाओं और धार्मिक पूजापाठ का सवाल है वो लोगों को मुश्किल परिस्थितियों से जूझने की ताक़त तो देते हैं लेकिन इससे शरीर के भीतर का वायरस ख़त्म करने में मदद नहीं मिलती.
यह आंकड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन का है. इन आंकड़ों के मुताबिक़ बीते साल एचआईवी से जुड़ी समस्याओं की वजह से क़रीब 10 लाख लोगों की मौत हो गई थी.
क़रीब 3.7 करोड़ लोग इस वायरस की चपेट में हैं. ऐसे लोगों की 70 फ़ीसदी आबादी अफ़्रीका में रहती है. साल 2017 में यहां 18 लाख नए लोग इस जानलेवा वायरस के शिकार बने.
एचआईवी संक्रमण का सीधा मतलब एड्स से है क्योंकि इसी वायरस की पहचान से एड्स की पहचान संभव है.
1980 के दशक में पहली बार इसके फ़ैलने की बात सामने आई. इसकी पहचान के बाद कई बातें इस बारे में कही गईं.
यह कैसे फ़ैलता है, एचआईवी संक्रमित लोगों के साथ जीना कितना मुश्किल है और न जाने क्या-क्या. इनमें से कुछ मिथ का प्रचार लोगों के बीच ख़ूब हुआ.
वर्ल्ड एड्स डे के मौक़े पर हम ऐसे ही मिथों के बारे में बताने जा रहे हैं.
मिथ: एचआईवी संक्रमित लोगों के साथ रहने से एड्स हो जाता है
यह एक ग़लतफ़हमी है, जिसका प्रचार काफ़ी लंबे वक़्त से होता आ रहा है. इसे दूर करने के लिए जागरूकता अभियान तक चलाए गए हैं पर उसका कोई बहुत ज़्यादा असर देखने को नहीं मिला है.
साल 2016 में 20 फ़ीसदी लोगों का मानना था कि एचआईवी संक्रमण हाथ मिलाने, गले मिलने से फ़ैलते हैं. उनका यह भी मानना था कि यह इंसान के लार और पेशाब के ज़रिए भी फ़ैलता है.
ये बात बिल्कुल सही नहीं है. वैकल्पिक चिकित्सा, यौन संबंध बनाने के बाद नहाने या किसी कुंवारे व्यक्ति या महिला के साथ यौन संबंध रखने से एचआईवी से सुरक्षा नहीं तय हो जाती.
वर्जिन के साथ संबंध बनाने' की दलील अफ़्रीका के कुछ इलाक़ों, भारत और थाईलैंड के कुछ जगहों में दी जाती था. लेकिन ये असल में ख़तरनाक़ है.
इस सोच ने कई युवतियों के बलात्कार और कुछ मामलों में बच्चों को भी एचआईवी संक्रमण के ख़तरे में डाल दिया.
माना जाता है कि इस सोच की जड़ें 16वीं सदी के यूरोप से जुड़ी हैं जब लोगों को सिफ़लिस और गोनोरिया जैसी बीमारियां होने लगीं थीं. इस तरह के क़दम इन बीमारियों के इलाज में भी कारगर साबित नहीं होते.
जहां तक प्रार्थनाओं और धार्मिक पूजापाठ का सवाल है वो लोगों को मुश्किल परिस्थितियों से जूझने की ताक़त तो देते हैं लेकिन इससे शरीर के भीतर का वायरस ख़त्म करने में मदद नहीं मिलती.
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